गुजरात के बाद फूलपुर लोकसभा सीट बचाने की होगी भाजपा की चुनौती 

इलाहाबाद । उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के लोकसभा से स्तीफा देने के बाद खाली हुए फूलपुर लोकसभा सीट पर मार्च तक उपचुनाव होना है , जिसके लिए लगता है गुजरात विधानसभा चुनाव के परिणाम का इन्तजार सबको है । जैसी खबर आ रही है की गुजरात में बीजेपी की सरकार बन सकती है , अगर कहीं उल्टा हुआ तो गुजरात के बाद फूलपुर लोकसभा सीट बचाना बीजेपी के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होगा । जहाँ कहा जाता है कि बसपा उपचुनाव नहीं लड़ती है तो समाजवादी पार्टी और बीजेपी के ही प्रत्याशी मैदान में रहेंगे । ऐसी हालत में दोनों बड़े दल का जोर बसपा के वोटरों को अपने तरफ करने की होगी ।
बीते हुए नगर निकायों के चुनाव में फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले चारो नगर पंचायतों पर विपक्ष का कब्जा है जिससे लगता है बीजेपी इधर कमजोर हुई है और उपचुनाव में अपनी सीट बचाना मुश्किल भरा हो सकता है । दूसरी तरफ बीजेपी ने नगर निगम में मंत्री की पत्नी को टिकट देकर बीजेपी के अन्य नेताओं के परिवार वालों के लिए रास्ते खोल रखे हैं तो बीजेपी के तरफ से अपर्णा यादव के नाम की भी चर्चा होती रहती है । बीजेपी से अन्य दावेदारों में से खुद केशव प्रसाद मौर्या के परिवार के साथ साथ डॉ विक्रम सिंह पटेल , विदुप अग्रहरि , दीपक पटेल , गुरु प्रसाद मौर्या , प्रदीप श्रीवास्तव , एलएस ओझा , आरके ओझा आदि हैं ।
विपक्ष की तरफ से इंद्रजीत सरोज , धर्मराज सिंह पटेल , नागेंद्र सिंह पटेल , मनोज पांडेय , बाल कुमार और साईकिल सिम्बल पर पल्लवी पटेल के भी उम्मीदवार बनने की चर्चा है । एक समीकरण के अनुसार बसपा के पूरे वोट लेने के लिए कांग्रेस के प्रत्याशी को भी विपक्ष समर्थन दे सकता है लेकिन इस समीकरण में दम कम है ।
दो नगर महापौर की सीट जीतने के बाद और जिस तरह से अल्पसंख्यक समुदाय का झुकाव बहुजन समाज पार्टी की तरफ हुआ है लगता है बसपा भी उपचुनाव लड़ सकती है क्योंकि बसपा के अल्पसंख्यक वोटों को जोड़ने के बाद आठ लाख वोटर होते हैं और अगर साठ प्रतिशत वोटिंग हुई तो लगभग पांच लाख वोट बसपा के पड़ सकते हैं । बसपा की तरफ से एसके पांडेय , रमतौलन यादव योग्य उम्मीदवार हो सकते हैं ।
फूलपुर की राजनीती में गुजरात का परिणाम नाममात्र का प्रभाव डाल सकता है फिर भी विपक्ष के पास यहाँ खोने को कुछ नहीं है उसे मिलना ही है अगर बसपा अपनी निति पर कायम रही तो परिणाम कुछ और भी हो सकते हैं लेकिन अगर बसपा ने उपचुनाव लड़ने का मन बनाया और अल्पसंख्यक ध्रुवीकरण बसपा की तरफ हुआ तो भी लड़ाई दिलचस्प त्रिकोणीय होने के आसार होंगे ।

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