#और_बरसात_होती_रही

स्वरचित उपन्यास का एक अंश

दिन तेज़ी से गुज़रे तो ज़िन्दगी को भी रफ्तार से अपने साथ खींच ले जाते हैं। यह तेज़ी न ज़िन्दगी का आभास ही नहीं होने देती है और न ही अपने होने का। दिन आरम्भ होकर भी आरम्भ नहीं होता क्योंकि वो स्व के लिए तो होता ही नहीं सामाजिक उत्तरदायित्व को निभाने के लिए होता है। इस भागते पल में कई बार ऐसा आभास होता है कि हम ज़िन्दगी के झोंको में उलट पलट रहे हैं।एक समय होता ह जब हम पतंग की डोर हाथ में ले, हवा की दिशा पहचानकर; डोर में ढील या थोड़ा तनाव देकर बहुत प्रयास से उसे आकाश में पहुँचा रहे होते हैं करते करते फिर एक समय ऐसा आता है जब पतंग खुद ही डोर को खींचने लगती है और मांझा अपने आप चकरी से छूटने लगता है। हम चाहते हैं कि उस मांझे को थामे रहें लेकिन पतंग को आसमान तक पहुंचाने की चाह भी तो हमारी ही थी न।

समझ पाना मुश्किल है कि ये कैसे दिन का उतार-चढ़ाव है जिसमें केवल कार्य,गतिविधियां,परियोजनाएँ मुख्य हैं। लगता है जैसे हम सब यंत्र हो गए हैं। लगता है जैसे हम मशीनी रोबोट हो गए हैं जिन्हें कमांड देने तक की भी ज़रूरत नहीं पड़ती और अपने-अपने कामों को निपटाने में स्वयम ही यंत्रवत लग जाते हैं।

बरखा के लिये यह सब दिन का आरंभ होना न था।रोज़मर्रा के कार्य में बीत रहा दिन दिन न था। दिन के लिए उसकी परिभाषा अलग थी। ऐसा दिन जब उसने सूर्य के निकलने से पहले उसके निकलने का इंतज़ार किया हो और हल्के नीले अंधेरा छोड़ते आकाश को तबतक निहारा हो जबतक सूरज की पहली किरण नहीं फूट ती; ऐसा दिन जब उसने सूर्यास्त की उस एक-एक कला के सौंदर्य को निहारा हो, डूबता सूरज को अपने हृदय के भीतर जगह दे दी हो,पलकों को समेट लिया हो।

औपचारिकता वश जब बरखा से कोई पूछता दिन कैसा बीता तो उसका उत्तर होता ,’दिन! दिन तो अभी शुरू ही नहीं हुआ’ भले ही उस समय शाम के 5 बज रहे होते। हो सकता सुनने वाले को यह उत्तर परेशान करता हो पर अपने ही उत्तर पर तुरंत ज़ोर से हंसकर बरखा सामने वाले को सहज कर देती।

महानगर की भागती ज़िन्दगी हमसे कितना कुछ ले लेती है न ऐसा सोचते हुए बरखा ने विविध भारती चलाया
गाना बजा
पूछ मेरा क्या नाम रे
नदी किनारे गांव रे
पीपल झूमे मोरे अंगना
ठंडी ठंडी छांव रे

साभार : Mamtaa Dhawan