देबेन्द्र के पिता ने 5% ब्याज की दर से 1 लाख किसी प्राइवेट फाइनेंसर से उठा लिया, विवाह धूम धाम से हुआ लेकिन फिर…

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ये तस्वीर दिल्ली के एक टैक्सीचालक देबेन्द्र की है।

देबेन्द्र मूलतः बिहार के बंका जिले के रहने वाले हैं। बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल थे। घर में देबेन्द्र के अलावा दो बहनें हैं जो ब्याही जा चुकी हैं। बेटियों के ब्याह के लिये पिता के पास कुछ जमापूंजी थी। परन्तु दो विवाह करने के लिये प्रयाप्त नहीं थी। देबेन्द्र के पिता ने 5% व्याज की दर से 1 लाख रुपया किसी प्राइवेट फाइनेंसर से उठा लिया। विवाह धूम धाम से हुये और हर महीने फाइनेंसर ने देबेन्द्र के घर दस्तक देनी शुरू कर दी।
हालात यह हो गये के मूल रकम चुकाना तो दूर पिता ब्याज़ की रकम भी चुकाने में असमर्थ थे। इसी दबाव में देबेन्द्र ने पढ़ाई बीच में छोड़ कर “कमाऊ पूत” बनने का निर्णय लिया और रोजगार की तालाश में दिल्ली आ गये।
टैक्सी चलानी शुरू की और अपनी गुज़र बसर लायक पैसा निकाल कर बाकी पैसा फाइनेंसर को किश्त के रूप में लौटाने लगे।

एक दिन देबेन्द्र की टैक्सी में काश्मीर का निवासी मिशिबुर वाणी बैठा। उसे एयरपोर्ट से पहाड़गंज तक जाना था। देबेन्द्र ने मिशिबुर को पहाड़गंज छोड़ा अपना किराया वसूला और वापिस टैक्सी स्टैंड की ओर चल पड़े। इसी बीच उनकी नज़र गाड़ी में पड़े एक बैग पर गयी।

बैग को उठाया तो समझने में क्षण भर भी ना लगा के यह मिशिबुर का बैग है जिसे कुछ ही समय पहले वह पहाड़गंज छोड़ कर आये हैं। बैग को खंगाला तो देबेन्द्र दंग रह गये। बैग में कुछ स्वर्ण आभूषण , एक एप्पल का लैपटॉप , एक कैमरा और कुछ डॉलर थे।

एक दम देबेन्द्र की आंखों के सामने फाइनेन्सर की तस्वीर आ गयी। इतने आभूषण बेच कर तो कर्जा आसानी से उतर सकता था। एक दम से प्रसन्न हो उठे।
मन में बैठा रावण जाग उठा। पराया माल अपना लगने लगा।

परन्तु जीवन की यही तो विडम्बना है। मन में राम और रावण दोनों निवास करते हैं।

कुछ ही दूर गये थे के मन में बैठे राम जाग उठे। देबेन्द्र को लगा के वह कैसा पाप करने जा रहे थे।

नैतिकता आड़े आ गयी।

बड़ी दुविधा थी। एक ओर आभूषण सामने पड़े थे और दूजी ओर अपनी अंतरात्मा खुद को ही धिक्कार रही थी।

कुछ देर द्वंद चला पर अंत में विजय राम की ही हुई। देबेन्द्र पास के पुलिस स्टेशन गये और बैग ड्यूटी पर मौजूद थानेदार के हाथ में थमा दिया। अब थानेदार कभी बैग में पड़े आभूषण देखे और कभी देबेन्द्र का चेहरा देखे। थानेदार ने कहा के तू अगर चाहता तो यह बैग लेकर भाग सकता था।

देबेन्द्र ने जवाब दिया साहब हम “गरीब” हैं “बेईमान” नहीं हैं।

थानेदार भी निःशब्द हो गया। उसे लगा पता नहीं यह आदमी किस मिट्टी का बना है।
ख़ैर मिशिबुर को उसका बैग सकुशल वापिस मिल गया। देबेन्द्र कि ईमानदारी के इनाम के रूप में मिशिबुर ने उसे कुछ रुपये देने की पेशकश की तो देबेन्द्र ने साफ मना कर दिया।

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असल कथा अब शुरू होती है। थानेदार ने देबेन्द्र की ईमानदारी की गाथा एक मीडियाकर्मी के आगे सुना दी । मीडियाकर्मी भी थानेदार की तरह अवाक रह गया। उसने देबेन्द्र की ईमानदारी की खबर अखबार ( हिंदुस्तान टाईम्स) में छापने की ठान ली । वह देबेन्द्र से मिला और उसका साक्षात्कार लेते हुये पूछा के अगर बैग में पड़े सामान की कीमत (8 लाख रुपये ) उसे मिल जायें तो वह क्या करेगा।

देबेन्द्र ने आपबीती सुना दी । उसने कहा के पहले तो फाइनेन्सर का कर्जा चुकाएगा और फिर अगर सम्भव हुआ तो एक टैक्सी खरीदेगा।

पहले थानेदार हैरान हुआ था अब रिपोर्टर महोदय हैरान हो गये। रिपोर्टर ने कहा के तेरे सर पर कर्ज़ है तो तू बैग लेकर भाग क्यों नहीं गया।

देबेन्द्र ने रिपोर्टर महोदय से भी कहा के साहब , हम गरीब हैं पर बेईमान नहीं हैं। थानेदार की तरह अब रिपोर्टर को भी लगा के यह आदमी किस मिट्टी का बना है।

रिपोर्टर ने देबेन्द्र की ईमानदारी की गाथा रेडियो मिर्ची एफ एम चैनल के एक रेडियो जॉकी नावेद को बताई।

नावेद भी देबेन्द्र से मिले और बातों बातों में उसे अपने एफ एम स्टूडियो में बुला लिया। नावेद ने एफ एम रेडियो के ज़रिए देबेन्द्र की कहानी दिल्लीवासियों को सुना दी।

साथ ही साथ दिल्ली वालों को देबेन्द्र के कर्ज के विषय में भी बताया। इसी के साथ एक खाता नम्बर भी दे दिया जिसमे धनराशी डाल कर वह ईमानदार देबेन्द्र का कर्ज़ा उतारने में उसकी मदद कर सकते थे।

अब यह देखना था के दिल्ली वाले किस मिट्टी के बने हैं।

2 घँटे में दिल्ली ने देबेन्द्र के खाते में 91751 रुपये डलवा दिये। किसी ने 1000 रुपये का योगदान दिया तो एक ऐसा दानी सज्जन भी था जिसने केवल 100 रुपये का योगदान दिया । सबने अपनी हैसियत के हिसाब से पैसा दिया और दिलवाली दिल्ली ने देबेन्द्र की ईमानदारी के उपहार में उसे ऋण मुक्त कर दिया।

यही नहीं रेडियो मिर्ची पर इस मुहिम के खत्म होने के बाद भी दिल्लीवालों ने देबेन्द्र से मिल कर उसे आर्थिक सहायता प्रदान करते रहे।

लाखों लोगों ने देबेन्द्र की ईमानदारी को सराहा है। देबेन्द्र आज भी कहते हैं के मन के रावण को राम पर हावी ना होने देना उनके जीवन की सबसे बड़ी जीत थी। अगर वह बैग लेकर भाग जाते तो कर्ज़ा तो उतार लेते पर खुद को कभी माफ ना कर पाते।

मैं मानता हूँ के मन में बैठा रावण आज की व्यवस्था में हावी है। परन्तु बारीकी से देखें तो मन में बैठा राम आज भी दशानन का वध करने में सक्षम है। अच्छाई और बुराई मे आज भी धागे भर का फासला है। इस ओर गये तो राम और उस ओर गये तो रावण।

देबेन्द्र ने दिल की सुनी और मतिष्क के तर्क को नकार दिया। दिल से सोचने वालों के लिये एक बड़ी खूबसूरत बात कही गयी है।

“दिल होता “लेफ्ट” में है पर होता हमेशा राइट है”

देबेन्द्र की ईमानदारी को नमन.. और नमन दिल्ली के हर उस व्यक्ति को जिसने इस ईमानदारी की कद्र की।

【 रचित 】

– साभार