खूबियों से लबरेज़ एक नौजवान शायर की दिलचस्प कहानी… जरूर पढ़ें

230

एक ऐसा शायर जो मोहब्बत के शेर पढ़ता था, अपनी उम्र की शायरी करता था, अपने गीतों से दिल के जज़्बात बयान करता था, उम्र का जुनून कुछ यूं था कि ज़ुल्फ़ और आँचल की शायरी करता था, मोहब्बत के नग़मे गाता था ।

उसी दौर की एक झलक,,,

तुझको ग़ज़ल लिखूंगा,,जब भी ग़ज़ल लिखूंगा,,ज़ुल्फ़ों को बदलियाँ,, और लब को कंवल लिखूंगा,,

जब से तुझको देखा, मैं खुद से पूछता हूँ,,कारीगरी हो किसकी, मैं खुद से पूछता हूँ,,

इसी ज़िक्र के साथ आपको बतलाती चलूँ कीकहते हैं ना कि शायर की सोंच आम लोगों की सोंच से मुख़्तलिफ़ होती है, उन्हें ज़माने के साथ चलने का हुनर आता है, कुछ ऐसा ही शायर #Shazada Kaleem के साथ भी रहा, ज़माने के साथ साथ इनकी शायरी के मज़ामीन में भी तब्दीली रोनुमा हुईं , और इश्क़-ओ-मोहब्बत, हिज़्र-ओ-विसाल की दास्तान के साथ इंसान के मुख़्तलिफ़ मसाइल और संजीदा मज़ामीन भी इनकी शायरी में बयान होने लगीं।

यूँ तो हर दौर में हमारे बीच ऐसी शख़्सियत आई जिनके अन्दर इंसानियत के दर्द के साथ साथ अपने क़ौम का दर्द हो।मौजूदा दौर में उर्दू शायरी के शोबे को देखा जाए तो #Shahzada Kaleem का नाम उभर कर सामने आता है जिसने अपनी शायरी के ज़रिए क़ौम का दर्द बैनुलअक़्वामी मेयार पर अवाम के सामने रखा है ।

अल्लामा इक़बाल ने कहा था ———–
दिल से जो बात निकलती है, असर रखती है,,पर नहीं ताक़त परवाज़ मगर रखती है,,,,

इसमें कोई दो राय नहीं के मौजूदा दौर में मुल्क के हालात और अपने क़ौम की बदहाली को पेशे नज़र रखते हुए यह शहज़ादा कलीम के दिल की आवाज़ है जो उनकी शायरी के ज़रिए उनके लफ़्ज़ों में दुनिया तक पहुंच रही है ।

दोस्तों,,,मेरा मक़सद कलीम की तारीफ करना नहीं बल्कि उनकी शायरी में जो हक़ाईक़, क़ौम-ओ-मिल्लत का दर्द साफ झलकता है उन्ही हक़ाईक़ से रोशनास कराना है ।

उन्होंने जब महसूस किया कि ज़माने में नफरतों का ज़हर फैल रहा, तफरक़ा बाज़ी बढ़ती जा रही, लोग इंतेशार फैलाने और नफरत-ओ-दुश्मनी को हवा देने से नहीं रुक रहे तो उन्होंने अपने हमवतनों से कुछ यूं कहा,,,,

एक हैं मिट्टी, एक ज़मीं तो आख़िर ये वहशत कैसी,,एक हैं शंखें, एक अज़ानें तो फिर ये नफरत कैसी,,क्यों अपने ही घर में अब वो हर पल ताने सहता है,,

रोकर अपने हमवतनों से ये एक शायर कहता है,,

उनका सफर यूँही जारी रहा, और हर दौर में कोई ऐसा मौज़ू नहीं जिसपर उन्होंने अपनी बात ना रखी हो।वक़्त बदला, हुकूमत बदली, निज़ाम बदला,एक ऐसा वक़्त आ गया जब मुसलमानों को बिलावजह मौत के घाट पहुंचाया जाने लगा, बेगुनाह नौजवानों को जेलों में डाला जाने लगा, जानवर के नाम पर इन्सान की जान ली जाने लगी,,

इसपर भी उन्होंने अपनी बात कुछ इस अंदाज में रखी,,,,

धर्म के नाम पर, चाय के नाम पर,,आस्थाओं की उस राय के नाम पर,,इस सदी में वतन की तरक़्क़ी है ये,,लोग मारे गए गाय के नाम पर,,

ये तमाम हादसों ने इस नौजवान शायर को कुछ यूँ मुत्तासिर करना शुरू कर दिया कि उनकी शायरी का रुख बदल गया और बदला तो कुछ यूँ बदला कि वो हुकूमत की आँख से आँख मिलाकर शायरी करने लगे और साफ लफ़्ज़ों में सवाल करने लगे और कुछ यूं कहा कि,,,

हम किस्से उम्मीद करें आख़िर किसकी सरकार में,,लाशों के सौदागर आ गए दिल्ली के दरबार में,,

साथ ही उन्होंने अपने समाज को भी आईना दिखाने का काम किया, अपने हुक्मरानों, रहबरों से अपने मुल्क की बेहतरी के लिए साफ तौर पर बात करनी शुरू कीउन्हें भी सही रास्ता दिखाते हुए उन्होंने एक नज़्म कही जो कुछ इस तरह हमारे बीच आई,,,

मुल्क के रहबरों नीन्द से जागकर,,तीरगी में उजालों की बातें करो,,फिर किसी अपनों का खून ना बहे,,बेसबब मरने वालों की बातें करो,, हमने तस्लीम करके तेरी रहबरी,, जान से प्यारा तुझको वतन दे दिया,,,

इस नज़्म को बैनुलअक़्वामी सतह पर लाना इस बात की कोशिश है कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़, मज़हब और ज़ात से ऊपर होकर इंसानियत की बुनियाद पर आवाज़ बुलंद करें, मज़लूमों को इंसाफ दिलाने की बात करें, इस तरह के पैग़ामात कलीम अपनी नज़्मों में रखने की कोशिश करते हैं। इसी तरह हर दौर में उन्होंने अपनी नज़्मों के ज़रिए लोगों को सच्चाई से रूबरू कराया, क़ौम के दर्द को अपनी शायरी का हिस्सा बनाते हुए उनकी कई नज़्में दुनिया के सामने आई, जो आज बहुतों के होठों लगे हैं,,

मिसाल के तौर पर—-

अबाबील फ़लस्तीन की नज़्म, कश्मीर की नज़्म ,वग़ैरा,,,,,,

एक दौर ऐसा भी आया जब एक खास क़ौम को टारगेट किया गया, उनसे हुब्बुल वतनी का सबूत मांगा जाने लगा, मुसलमानों के ऊपर दहशतगर्द का इल्ज़ाम लगाया गया तो इस मामले से भी मुतास्सिर होकर एक शायर अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए एक नज़्म के ज़रिए, यूँ कहूँ तो अपने शायराना अंदाज़ में अपने क़ौम की आवाज़ बनकर, मुल्क से मोहब्बत की दलील पेश की, और जंग-ए-आज़ादी से लेकर अब तक इस मुल्क पर मुसलमानों की क़ुर्बानि और उसके किरदार का भरपूर खुलासा किया, आसान से लफ़्ज़ों में कहूँ तो एक ही नज़्म में उन्होंने हिंदुस्तान की तारीख़ पिरो डाली, जो कुछ इस तरह हमवतनों के सामने आईं ——–
ज़हर उगलने वाले क्या तारीख़ पुरानी भूल गए,,,,??मुल्क को हमने अब तक जो दी, सब क़ुरबानी भूल गए,,? याद करो जब अंग्रेजों से काँप गयी थी माटी,,,तब हैदर के लाल ने तन्हा सबकी नीन्द उड़ा दी,,

क़ुर्बान हो गए मुल्क की ख़ातिर वह #टीपू सुल्तान था,,वह भी मुसलमान था,, वह भी मुसलमान था,,

दिन ब दिन बिगड़ते हालात को उन्होंने कुछ यूँ महसूस किया कि जब इस मुल्क में बेटियों, बहनों पर ज़ुल्म हुआ तो ये मामला भी उन्हें झिंझोड़ कर रख दिया और वहां भी उन्होंने अपनी उस बहना, बेटियों के दर्द को अपनी शायरी का हिस्सा बनाया तो कुछ यूं हुआ————-
तू तो कहता था बेटी हूँ, रहमत हूँ मैं,,,घर की ज़ीनत हूँ और तेरी इज़्ज़त हूँ मैं,,

चिंखती रह गई हाथ मैं जोड़कर,,लूटी इज़्ज़त मेरी सब हदें तोड़कर,,,तुम हो इंसान लिखा ये वरक़ मोड़कर,,जा रही हूँ मैं दुनिया तेरी छोड़कर…….

इनकी ये नज़्म तारीख़ी इदराक में महफूज़ रखने के क़ाबिल है , जिसमें उन्होंने एक बेटी के दर्द को शजाअत के साथ अवाम के रूबरू रखा, उसमें सिर्फ उनकी शायरी नहीं बल्कि एक बेटी का दर्द झलकता है, उसकी महसूस की हुई तकलीफ़ साफ तौर पर वाज़ेह होती है ।

दोस्तों, बस इतना ही नहीं, जब ज़ुल्म-ओ-ज़्यादती सर चढ़कर बोलने लगी, लोग ख़ुद को बेबस समझने लगे, ज़ालिम ख़ुद को ताक़तवर समझ बैठे तो एक क़लमकार को ये एहसास हुआ कि इस सिस्टम को कोसने से, ख़ुद को बेबस समझने से कुछ नहीं होगा, मुल्क में अमन और तरक़्क़ी के लिए हमें हमारी नस्लों को तालीम के ज़ेवर से आरास्ता कराना होगा,, तो उन्होंने तालीम पर बातें करीजो कुछ इस तरह आई————
बस खुदा पर भरोसा रखो और पढ़ो,,बुग़ज़ नफरत से मुँह मोड़ लो पहले तुम,,,मुत्तहिद होकर निकलो हर एक राह पर,,ख़ुद को तालीम से जोड़ लो पहले तुम,,,

उन्होंने अपने इस शेर के ज़रिए नई नस्लों को समझाया कि मायूसी कुफ्र है, मायूसी से हटकर ज़माने के इस जंग को जीतने कि एक ताक़तवर हथियार तालीम है..

तुम ख़ुद को उससे जोड़ दो, दुनिया की कोई ताक़त तुम्हें नहीं हरा सकती ।

जहां तक मैं उन्हें जानी हूँ वह यही है कि एक शायर अपने बेबाक लहजे में बिना किसीसे डरे हर ज़ुल्म पर अपनी शायरी के साथ खड़े हैं। अपने तेवर में एक अलग ही जोश-ओ-जुनून लिए हुए, जिसके लहजे में ऐसी बात साफ तौर पर वाज़ेह है जो दुश्मनों को मात दे दे । उन्होंने अपनी शायरी के ज़रिए मायूसियों से बुझते दिलों को हौंसलों से रौशन किया,,

डूबते सफिनों को किनारे का पता बताया, ख्वाबों को मुकम्मल करने की हिम्मत दी । उनकी शायरी का मक़सद सिर्फ हम और आपके तफ़रीह का नहीं है बल्कि अपनी शायरी के ज़रिए वह मुल्क को अमन और मिल्लत का पैग़ाम देना चाहते हैं हमें और आपको इसपर संजीदगी से सोचने और अमल करने की ज़रूरत है ।

Note- दोस्तों, उनकी शेरी सफर इतनी ही तो नहीं है हमने बस कुछ अहम पहलू निकाल कर आप सबको रूबरू कराया । बहुत नए और पुराने कलाम भी मौजूद हैं इंशाअल्लाह बाक़ी फिर कभी ।

Nishat Sheikh…..✍