उसके कपड़ों की पसंद को तुरंत नग्नता से जोड़ दिया जाता है, शरीर की सुंदरता को सेक्स से जोड़ दिया जाता है…

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लेबल:-

समाज को मुंह चिढ़ाती यह तस्वीर अपने आप में बहुत कुछ बयान करती है….

एकदम शुरूआत से ही उसको मनचाहे और सुविधाजनक ढ़ांचे में ढालने की नींव डाल दी जाती है।
स्त्री यदि समाज द्वारा बनाई लकीरों पर बिना किसी विरोध के चुपचाप सिर झुकाए चलती रहती है तो उसे… संस्कारी, संतोषी, त्याग की देवी, संकोची,सभी रीति रिवाजों को पूरी श्रद्धा से मानना, गाय और बकरी बन कर रहना…जीवन भर अपनी हर संभव सेवाएं देती रहे और अंत में अपने शरीर से अपने मालिक के शरीर की इच्छा पूर्ति करती रहे तो महान…
लेकिन….
अगर….
ज़रा सा भी लकीर से अलग चलना चाहा या खुद की लकीर बनाने की सोची भी तो सबसे पहला विरोध उसे अपने सबसे नजदीक के रिश्तों से झेलना पड़ता है… फिर समाज के ठेकेदार राहों में कांटे बिछाने का काम करते ही हैं।
हर संभव प्रयास किया जाता है उसे घिसी पिटी उबाऊ लकीरों को ही अपना भाग्य मानने के लिए।
इसके लिए उसे कुछ चिरपरिचित इल्जामों के चाबुक लगाए जाते हैं।
जैसे…
तुम बहुत स्वार्थी हो…
दिमाग का इस्तेमाल किचन तक ही रखना था…
बहुत ईगो भरा है…
कपड़ों की पसंद को तुरंत नग्नता से जोड़ दिया जाता है…

शरीर की सुंदरता को सेक्स से जोड़ दिया जाता है…
उसकी प्रखर बुद्धि को उसके घमंड का मापदंड मान लिया जाता है….
उसकी स्वतंत्रत सोच को स्वछंदता का अभिप्राय मान लिया जाता है…
उसके प्राकृतिक अभिव्यक्ति को दिखावा (फेक)का नाम दे दिया जाता है…
उसके रंग रूप कद या तो चरित्रहीनता माता जाता है या फिर कुरुप का लेबल चिपका दिया जाता है…

कुछ भी हो लेकिन स्त्री को उसके विचारों अनुसार नहीं बल्कि समाज के द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप ही स्वीकार किया जाता है….जो बेहद अफसोसजनक है क्योंकि ये एक स्त्री के पूरे वजूद को नकारने जैसा है।

#पूनम_मिर्ची

फोटो- third-party image