बिहार की रहने वाली आफ़रीन मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ के उर्दू डिपार्टमेंट में पीएचडी कर रही थी, यूनिवर्सिटी के ही सरोजिनी नायडू हॉल में…

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बिहार की रहने वाली आफ़रीन मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ के उर्दू डिपार्टमेंट में पीएचडी कर रही थी। यूनिवर्सिटी के ही सरोजिनी नायडू हॉल में रहती थी। एक दिन अचानक उसकी तबियत ख़राब हो गई। हॉस्टल की रूममेट उसे यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ले गई। रात भर इलाज चला, कई सारे टेस्ट हुए, फ़िर डॉक्टर ने बताया कि दोनों किडनी फेल हो चुकी है। दिल्ली में ऑपेरशन कराना पड़ेगा। आफ़रीन के घर वाले आए और उसे लेकर दिल्ली चले गए। वहाँ गंगाराम हॉस्पिटल में इलाज शुरू हुआ।

हॉस्पिटल वालों ने बताया कि ऑपेरशन में पच्चीस लाख लगेंगे। माँ-बाप की इतनी हैसियत न थी कि इतने कम समय में पच्चीस लाख रुपए का इन्तज़ाम कर सके। यह बात केवल आफ़रीन की रूममेट नूरुन्निसा केपी को पता थी। केरल की नूरुन्निसा ने यूनिवर्सिटी में पच्चीस लाख इकट्ठा करने के लिए कैम्पेन शुरू की। देखते ही देखते और छात्राएँ साथ आईं और हर हाल के बाहर पोस्टर लग गए। छात्रों ने टीम बनाई और अलग अलग टीचरों से पैसे लेने अलग अलग डिपार्टमेंट पहुँचने लगे। मैं भी अन्य साथियों के साथ इसी तरह डिपार्टमेंट-डिपार्टमेंट टहल टीचरों से पैसे माँग रहा था।

एक हिन्दू टीचर के चैंबर में जाना हुआ। टीचर को हमने सारी बात बताई। उन्होंने तुरंत अपना पर्स निकाला और उसमें जितने पैसे थे सब निकाल कर हमें दे दिया। हम उनको शुक्रिया बोल कर कमरे से बाहर निकल ही रहे थे कि उन्होंने रोका और बीस रुपए वापिस माँगे। कहा कि डिपार्टमेंट से वापिस घर जाते समय मैं कॉफ़ी पीता हूँ, पैसे नहीं हैं। हमने उनके साढ़े-सात हज़ार रुपए में से बीस रुपए निकाल कर उन्हें दे दिए। उन्होंने पैसे लेते समय अगले दिन फिर आने को कहा। अगले दिन हम पहुँचे तो टीचर मुझे अपने स्कूटर पर बिठा कर करीब के एटीएम ले गए और अपने एकाउंट से बीस हज़ार रुपए निकाल कर दे दिए। इसी तरह हॉस्टल के लड़कों ने भी रूम टू रूम जाकर पैसे जमा किए और इसी तरह चार दिन के अंदर ही आफ़रीन के एकाउंट में छब्बीस लाख रूपए आ गए।

अलीगढ़ में बड़े अजीब अजीब लोग रहते हैं। हर तरह के लोगों के लिए हर तरह के नाम हैं जैसे डीलर, कप्तान, पाइप आदि। साइंस फैकल्टी में एक बड़ा पाइप है। उसको अपनी तरफ़ आता देखते ही रास्ता बदलने का मन करता है। ख़ामख़ा ही डेढ़ घंटा बर्बाद करेगा। एक दिन इसी पाइप ने हमें धर लिया। पूछा कि यार ये बताओ वो सलमान तुम्हारा दोस्त है न। हमने कहा हाँ, क्या हुआ। उसने जवाब दिया कि सलमान का एक दोस्त है अभीक जैसवाल, उसको जानते हो? हमने कहा हाँ, थोड़ी बहुत जान पहचान है, हुआ क्या है? उसने कहा कुछ नहीं, बस ये पता करो कि घर से पैसे-वैसे के मामले में कमज़ोर है क्या। मैं कहा ठीक है पता कर लुंगा पर बात क्या है। उसने बोला कुछ नहीं बस कल डीएसडब्ल्यू के ऑफिस गए थे, वहाँ इसको देखे की हज़ार रुपए की स्कॉलरशिप के लिए खड़ा मरा रहा था। हबीब हॉल से पैदल आया था हज़ार रुपए की स्कॉलरशिप के लिए। हमने इस बात पर इतनी तवज्जो नहीं थी। खैर पता किया तो मालूम हुआ कि सच में अभीक गरीब परिवार से आया है। हमने इस पाइप को यह बात बता दी। इस बात को अब करीब डेढ़ साल हो गए हैं और तबसे लेकर आजतक अभीक की डाइनिंग और ट्यूशन फीस कोई और अदा कर रहा है। किसी को नहीं मालूम कि यह फीस कौन जमा करता है, बस जमा हो रहे हैं, दिन कट रहे हैं। अभीक ने शुरू में जानने की कोशिश करी फिर उसने भी शायद भगवान की कृपा मानकर छोड़ दिया। हमको मालूम है कि यह उस पाइप का काम है।

अब्दुल्ला हॉल की अरीशा के अब्बा की तबियत बिगड़ गई। हॉस्पिटल ले जाया गया तो मालूम हुआ कि ओपन हर्ट सर्जरी करानी पड़ेगी। अरीशा के लिए बड़ी मुसीबत थी, घर मे अब्बा ही इकलौते कमाने वाले थे और इतनी जमा पूंजी भी न थी कि यह सर्जरी करा पाते। ख़ैर, यह बात अरीशा के दोस्तों को पता चली तो उन्होंने फेसबुक और वाट्सएप पर अपने दोस्तों से मदद माँगी। अलीगढ़ के बुलबुलों ने हफ़्ते भर में अरीशा के एकाउंट में इग्यारह लाख जमा करा दिए। पैसे जमा करने वालों ने बस सामने से यह पूछा कि केस जेन्युइन तो है न। इस तरफ़ से एक हाँ क्या मिला कि एक अनजान आदमी के इलाज के लिए इतने पैसे जोड़ दिए।

अभी पिछले हफ़्ते ही आज़मगढ़ के एक भाई का व्हाट्सएप पर एक मैसेज आया। उनके किसी जानने वाले को इलाज के लिए पैसे की ज़रूरत थी। अब चूंकि भाई काफ़ी संजीदा आदमी हैं, मैंने उनके मैसेज को अपने सर्कल में सर्कुलेट कर दिया। इसी तरह सब छात्रों के पैसे से उन भाई के जानने वाले का इलाज हो गया। अभी परसों भाई चुंगी पर मिल गए तो हमने पूछ दिया कि वो जानने वाले कौन थे। उन्होंने बताया कि उनके एक पुराने रूममेट का जानने वाला पिछले साल एंट्रेंस एग्जाम के टाइम उनके रूम पर रुका था। यह उसका चचेरा भाई था। उंसियत का लेवल देखिए आप।

ऐसी सैंकड़ो कहानियां अलीगढ़ में तैरती हैं। यह कहानियां यहां सबको पता है, सब जानते हैं। इतनी नॉर्मल हैं कि कोई इनका ज़िक्र तक नहीं करता। आपको ऊपर से छेत्रवाद, लड़ाई, चुनाव, रूढ़िवाद, शेरवानी, गमछा दिखेगा। अंदर से देखेंगे तो आपसी सौहार्द और ऊंसियत का काबा है यह जगह। हमको मालूम है कि एक गेटकीपर की बहन की शादी बाद उसके ससुराल वाले जब दहेज़ के लिए उसे ज़िंदा जला देते हैं तो उस गेटकीपर से माँग कर बीड़ी पीने वाला वह दो टके का नेता ही अपने पैसों से इस केस को लड़ता है। ससुरालियों को बाक़ायदा सज़ा होती है।

ऊपर लिखी सब बातें सच हैं, बस नाम बदले गए हैं। मैं खुद पात्र था इनमें से कई कहानियों में। अभी आज ही लाइब्रेरी कैंटीन पर एक अज़ीज़ दोस्त मिल गए। उनसे कहा कि आपकी फैकल्टी में एक नया खेल आया है। अजीब तरह से चलता है। उन्होंने कहा जानता हूँ उसको। हमने पूछा कि कैसे जानते हैं तो उन्होंने बताया कि इस खेल के कॉलेज ड्रेस के लिए पैसे का इंतज़ाम मैंने ही किया था। वो मुझको नहीं जानता है, पर कभी तुम्हारी उससे बात हो तो कहना की कमीना तनी कम एटीट्यूड में रहा करे।

अब आप बताइए कि बस इसलिए कि यहाँ का पॉलिटिकल डिस्कोर्स आपके जितना उच्च नहीं है तो नफ़रत करें इस जगह से। यह हमसे न हो पाएगा। नफरत करते करते ही मुहब्बत हुई है। चार ठो गदहा लोग थोड़ा ज़मीर बेच का राजनीति करने लग गया आप उसको इतना जनरलाइज़ कईसे कर देंगे भाई? आज हम बोलेंगे #ProudToBeAlig

साभार : Sharjeel Usmani