तालियों की गूंज लय में होती, मैं अपने फ्लैट में कुछ पढ़ने बैठता तो ज़हन भजनों में चला जाता..लेकिन

99

नौ दिन यानी नव दुर्गा पूजा। मधुर आवाज़ में गाती महिलाएं। बिल्डिंग में एक उत्सव था। मेरे बंद फ्लैट में भी आवाज़ें ऐसी आती थीं मानो भजन मेरे आंगन में हो रहे हों। इन नौ दिन में मुझे अलार्म लगाकर नहीं सोना पड़ा। सुबह आंख घंटियों की आवाज़ से खुलती थी। सुबह की पूजा पाठ के बाद अपने पतियों को ऑफिस के लिए रुखसत करतीं महिलाएं। बच्चों को स्कूल भेजतीं। मैं उन्हें जाता देखता, क्योंकि मेरा दफ्तर शाम से शुरू होता है तो पूरा दिन फ्लैट में ही रहता।

सारे काम से फारिग होकर महिलाएं सज संवरकर फिर एक जगह बैठतीं। कोई तीसरा पहर का वक़्त होता। ढोलक की थाप। एक स्वर में गाती हुईं। तालियों की गूंज लय में होती। मैं अपने फ्लैट में कुछ पढ़ने बैठता तो ज़हन भजनों में चला जाता। लैपटॉप खोलता तो काम नहीं कर पाता। लेकिन मुझे एक दिन भी उनसे दिक्कत नहीं हुई। मुझे नहीं लगा वो मुझे डिस्टर्ब कर रही हैं। ये ही फील हुआ वो पूजा कर रही हैं। भगवान की उपासना या खुदा की इबादत से तकलीफ दुष्टों को या शैतान को होती है। और मैं तो नास्तिक भी नहीं तो मुझे क्या दिक्कत होती।

खैर इन नौ दिन जितनी तपस्या से वो पूजा कर रही थीं। मैंने तय किया मैं इन दिनों मीट बिल्डिंग में नहीं लाऊंगा। अंडे भी नहीं लाया। ऐसा नहीं था कि मुझे उन्होंने मना किया था या फिर मुझे किसी बात का खौफ था, बल्कि ये एहतराम था उनकी पूजा का। ताकि मेरे फ्लैट में बनने वाले मीट की खुश्बू बिल्डिंग में न फैले। मीट नहीं बनाया तो खाया भी नहीं, और ऐसा नहीं है कि बिन खाएं मैं मर गया हूं। ज़िंदा हूं। तात्पर्य ये है कि देश में नफ़रत रूपी रावण आ गया है। उसका वध करने राम नहीं आएंगे, हमें आपको मिलकर करना होगा। प्रेम से। मिलाप से।

विजयादशमी की आपको शुभकामनाएं।

साभार : मो. असगर